मै जब छोटा था और गर्मी के दिन शहर में रह रहे घर के बच्चे गांव आते थे और उनके मुख से जब उनके शहर कि बड़ी बड़ी बाते सुनता था तो इस में होता था कि कब यहां से निकलूंगा और इस सपने के शहर में जाऊंगा । गर्मी की छु्टियां ख़तम हो जाती थी और सब अपने शहर चले जाते थे और हम वापस हम अपने काम लग जाते सुबह भोर में जग जाना थोड़ा सा पड़ना लेकिन पड़ने में मन कहा मन में तो शहर था अधे मन से सब काम करना स्कूल जाना और इस तरह २००७ में वो समय आ गया कि शहर जाना ही पड़ा लेकिन घर में मां उदास लेकिन बापू का तो रोज वही बात की जा रहे हो पड़ने के लिए वो शहर है सही से रहन कहा से पैसे दूंगा ये तो तुम को पता हर समय यही लेक्चर देते थे सोचता थे कब जाने वाला दिन आयेगा इन बातो से छुट्टी मिलेगी वो दिन आया मै तो बहुत उत्सुक था जो मै अपने सपनों के शहर जा रहा था मां कि वो नम आखे बहन का उतार हुए चेहर सब को देख कर भी मै तो अलग धुन मै था और सुरु हुए मेरा साफर और आज तक सफर मै ही हूं लेकिन अब वो १० दिन का गांव में रहन बहुत कम लगता है सोचता हूं काश यह पे सब होता तो कहीं नहीं जाता अब तो सब अलग हो गया बाकी की सोच अगले मै लिखता हूं
मेरे ये पहल दिन है गलत हो तो सही करने का सुझाव दे
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